इन दिनों सबकी जुबान पर एक ही नाम है वो है कारा (एक प्रथा ) अब कारा क्या है और क्यों ये प्रथा इन दिनों सुनने को मिल रही है ,दरअसल 20 दिसम्बर को उत्तराखंड सिनेमा जगत में ऐसी फिल्म रिलीज़ हुई जिसने ना सिर्फ हमें सोचने पर मजबूर किया बल्कि ये भी बताया कि उत्तराखंड का सिनेमा अब किस स्तर पर पहुँच चुका है,माँ शक्ति पिक्चर्स के बैनर तले बनी गढ़वाली फिल्म ‘कारा एक प्रथा ‘देहरादून के मॉल ऑफ़ देहरादून में बीते 4 दिनों से हॉउसफुल चल रही है और जिसने भी अब तक ये फिल्म देखी उसने सिर्फ एक ही बात कही वाह ! क्या फिल्म है।
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कारा एक प्रथा को जानने से पहले उस इंसान को जानना जरुरी है जिन्होंने इस प्रथा को समाज तक सिनेमा के जरिए पहुँचाया,इस प्रथा को फिल्म का रूप दिया है उत्तराखंड फिल्म जगत के अभिनेता,निर्देशक सुनील बडोनी ने,कारा एक प्रथा फिल्म के ट्रेलर लॉन्च इवेंट पर हिली न्यूज़ से सुनील बडोनी ने इस बात का जिक्र किया था कि ये फिल्म उन्होंने एक अख़बार की खबर से प्रभावित होकर लिखी और यकींन मानिए अगर आपने फिल्म देखी या अब देखने की सोच रहे हैं तो एक पल के लिए भी आप निराश नहीं होंगे, 2005 में एक खबर अख़बार में छपी थी ‘कारा का चढ़ता पारा और एक गाँव में लड़की की लगी बोली,एक लेखक की सोच देखिए एक खबर पर फिल्म बनाई और ना सिर्फ बनाई बल्कि ऐसी प्रथा से समाज को रूबरू करवाया जो 21 वीं सदी की है और किसी को इस बारे में कुछ पता भी नहीं है।नौकरी में व्यस्तता के कारण तब वो फिल्म तो नहीं बना सके लेकिन अब जाकर ये फिल्म बनी और 4 दिनों में ही इस फिल्म ने कमाल कर दिया।
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कारा एक प्रथा ना सिर्फ फिल्म है बल्कि इसी समाज की हकीकत है घरेलू हिंसा ,शराब का प्रचलन आम हो गया है और खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में शराब ने कई घर उजाड़ दिए ,ये फिल्म 3 घंटे की है लेकिन दर्शक इसे ख़त्म होना ही नहीं चाहते ,लेखक सुनील बडोनी ने वर्षों का अनुभव इस फिल्म में झोंक दिया और आज ये फिल्म सफलता पा रही है,फिल्म का हर पहलू शानदार है ,कलाकारों का चयन ऐसा है मानो ये इन्हीं की कहानी हो ,कहते हैं हीरे की परख जौहरी को ही होती है तो सुनील बडोनी ने उत्तराखंड के कलाकारों को इस फिल्म से हीरा बना दिया,फिल्म में मुख्य किरदार में शिवानी भंडारी (जमुना ) और रमेश रावत (मोना) के किरदार में हैं पूरी कहानी इन्हीं दो पात्रों पर घूमती है।दोनों ने ही अपने किरदारों को जीने का काम किया है,शिवानी भंडारी जहाँ एक परिपक्व कलाकार नजर आई ,मानों यहीं जमुना हों और उस दर्द को इसी लड़की ने झेला हो,इतनी कम उम्र में इतना मंझा हुआ किरदार शायद ही कोई और निभाता लेकिन शिवानी ने अपनी काबिलियत दर्शाई,मोना के किरदार में रमेश रावत ने वर्षों पुराने कलाकार को बाहर निकाला और नेगटिव किरदार में ऐसे घुसे कि भले ही फिल्म में किरदार नकारात्मक था लेकिन जब दर्शक बाहर आए तो रमेश रावत को देखकर बोले ये मोना नहीं हो सकता ,निर्देशक सुनील बडोनी ने वो कर दिखाया जो अब तक किसी अन्य निर्देशक ने नहीं करवाया।
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फिल्म में जग्वाल फिल्म की नायिका कुसुम बिष्ट भी हैं लेकिन उनका अभिनय इतना असर नहीं डाल पाया और इतने लम्बे अरसे बाद फिल्म में नजर आने पर भी दर्शकों में उनको देखने की उत्सुकता ख़त्म हो गई,मोना के दोस्त चतरू का किरदार निभा रहे राजेश नौगाई ने अपने अभिनय से सबको चौंका दिया,और बता दिया कि एक दोस्त अगर अच्छा हो तो जिंदगी संवर सकती है वहीँ अगर बुरा हुआ तो नर्क बनते देर नहीं,राजेश लम्बी रेस का घोडा है और अभी कई और किरदार उनके अंदर से बाहर आ सकते हैं,फिल्म में पंडित जी की भूमिका में दिनेश बौड़ाई ने खूब आकर्षित किया,वहीं राजेश मालगुडी ने कम स्क्रीन टाइम मिलने के बावजूद अपना प्रभाव छोड़ा,फिल्म में प्रधान की भूमिका में अजय सिंह बिष्ट एक सधे हुए किरदार लगे जिनके डायलॉग बोलने का अंदाज निराला है,वहीँ सेवादार की भूमिका में रमेश नौडियाल ने न्याय किया है और एक सहकर्मी का किरदार बखूबी निभाया,वहीं पहली बार फिल्म में नजर आई साक्षी काला ने भी खूब प्रभावित किया और मुख्य किरदार की बहन होने के बाद भी दर्शकों की नजरों में आ गई,वहीं दिव्या ने भी अपने चुलबुले अंदाज का परिचय दिया।फिल्म के बाकी पात्रों ने भी अपने किरदारों में खूब मेहनत की और अपनी छाप दर्शकों पर छोड़ी,फिल्म में बिनीता नेगी,संयोगिता ध्यानी, इंदु रावत ,रोशन धस्माना ,वीरेंद्र सिंह असवाल सहित अन्य कलाकार हैं।
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अब बात करते हैं फिल्म क्यों इतनी ख़ास बनी फिल्म की कहानी पर शोध किया गया जहाँ कि घटना थी वहां जाकर इसकी जांच पड़ताल की गई,और पटकथा में दम है,फिल्म का तकनिकी पक्ष शानदार है,कई लोग बोलते हैं कि उत्तराखंडी फ़िल्में बजट के चलते पिछड़ जाती हैं लेकिन सारांश बडोनी ने इस फिल्म को बेहतरीन फिल्माया और संपादन में भी जान डाल दी एक-एक सीन को पूरी फिल्म बनाया तभी ये सफल हो पाई,फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक तैयार करने वाले आशीष पंत ने बता दिया कि कहानी अच्छी हो कलाकारों का अभिनय अच्छा हो तभी BGM भी काम करेगा अन्यथा एक म्यूजिक डायरेक्टर के पास विकल्प ही नहीं बचते,आशीष ने अपना अनुभव इस फिल्म में झोंका और फिल्म हर तरफ तारीफ़ बटोर रही है,फिल्म एक ऐसी प्रथा पर आधारित है जिसमें गीत संगीत और नाच गाना उचित नहीं बैठता तो फिल्म में कोई गीत भी नहीं है बस अनुराधा निराला का एक गीत है जो जमुना की जिंदगी पर फिट बैठता है जिसमें संतोष खेतवाल का संगीत है।
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फिल्म शानदार है और हर किसी को देखनी चाहिए और जानना चाहिए कि आखिर कारा एक प्रथा क्या है,जब से फिल्म का ट्रेलर रिलीज़ हुआ है तबसे सबकी उत्सुकता इस प्रथा को जानने की थी कई लोगों ने गूगल का भी सहारा लिया लेकिन कहीं कुछ मिला नहीं अभी फिल्म मॉल ऑफ़ देहरादून में लगी हुई है तो आप फिल्म में इस प्रथा को जान सकते हैं,बस इतना जान लीजिए हमारे समाज के ही लोगों ने ऐसी प्रथा बनाई थी जिससे एक महिला को उसका आत्मसम्मान मिल सके उसे भी समाज में सम्मान से जीने का हक़ है।
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सबकी भांति फिल्म का अंत हमारी अपेक्षा के उलट था लेकिन सुनील बडोनी ने इसमें निर्देशक का महत्त्व बताया कि सब कुछ दर्शकों पर छोड़ देंगे तो निर्देशक क्या करेगा।निर्मात्री परिणीता बडोनी के अथक प्रयासों की सराहना होनी चाहिए जो दिन रात सिनेमाहॉल तक स्थानीय फिल्मों को देखने के लिए प्रेरित कर रही हैं।
कारा एक प्रथा की पूरी टीम को हिली न्यूज़ की तरफ से ढेर सारी शुभकामनाएं।
जनता की जुबानी कारा एक प्रथा की कहानी :


