उत्तराखंड फिल्म जगत के लिए वर्ष 2024 स्वर्णिम वर्ष रहा इस साल स्थानीय भाषा की 12 फ़िल्में सिनेमाहॉल में रिलीज़ हुई ,अलग -अलग विषयों पर बनी फ़िल्में साल भर चर्चा का विषय बनी रही,पहली जौनसारी फिल्म भी इसी वर्ष सिनेमाहॉल तक पहुंची और इस फिल्म ने उत्तराखंड फिल्म जगत के रिक्त स्थान को पूर्ण कर दिया,20 दिसम्बर को 3 गढ़वाली फीचर फ़िल्में रिलीज़ हुई जिनमें कारा (एक प्रथा ) और रत्तब्याण (भोल फिर रात खुलली ) देहरादून एवं जोना टिहरी गढ़वाल में प्रदर्शित हुई तीनों फिल्मों को देखने जनता सिनेमाहॉल तक पहुँच रही है और उत्तराखंड के सिनेमा में विस्तार हो रहा है।
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20 दिसम्बर को रत्तब्याण (भोल फिर रात खुलली ) रानीपोखरी स्थित छोटू महाराज सिनेमाहॉल में रिलीज़ हुई ,अशोक चौहान (आशु) के निर्देशन में बनी फिल्म माहेश्वरी फिल्म के बैनर तले रिलीज़ किया गया ,फिल्म में संजू सिलोड़ी,कनिका बहुगुणा ,राकेश गौड़ ,राजेश मालगुडी सहित कई कलाकार हैं।
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निर्माता,निर्देशक अशोक चौहान बीते तीन दशकों से फिल्म निर्माण में सक्रिय हैं ,एक अभिनेता के रूप में भी कई फिल्मों में नजर आ चुके हैं और अब निर्देशन से स्थानीय भाषा की फिल्मों को सजा रहे हैं ,रत्तब्याण जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है एक ठेठ गढ़वाली शब्द है जिसका अर्थ (रात के बाद सुबह का वो समय जब अन्धकार समाप्त होने वाला है ) इस फिल्म के जरिए अशोक चौहान ने समाज को ये सन्देश देने का काम किया कि रत्तब्याण का समय हर व्यक्ति के जीवन में आता है और लाख अँधेरा हो जाए एक ना एक दिन सवेरा जरूर होता है।
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फिल्म की कहानी काफी अच्छी है और फिल्म महिलाप्रधान है,फिल्म के जरिए एक आम इंसान ,पत्रकार ,पुलिस और खनन माफिया के जीवन को दर्शाया गया है,फिल्म मैं एक ऐसी लड़की के संघर्ष को दिखाया गया है जो शिक्षा के बलबूते सफलता के शिखर तक पहुँचती है,रत्तब्याण में कनिका बहुगुणा ने उस लड़की का किरदार निभाया है जो संघर्ष करके एक सब इंस्पेक्टर के पद तक पहुँचती है,कनिका की ये पहली फिल्म है तो उन्होंने अपने अभिनय का परिचय बखूबी दिया,फिल्म में लेडी सिंघम का अवतार शानदार नजर आय और पुलिस की वर्दी उनपर खूब जची संजू सिलोड़ी इस फिल्म में एक पत्रकार की भूमिका में हैं फिल्म में संजू सचमुच के पत्रकार लगे और दर्शकों ने उनके इस किरदार को खूब पसंद भी किया।दोनों के रोमांटिक सीन पर दर्शक काफी उत्साहित नजर भी आए ,इन दोनों कलाकारों को अगर छोड़ दिया जाए तो राजेश मालगुडी के अलावा और कोई किरदार ऐसा नजर नहीं आया जिन्हें देखकर लगे कि ये कहानी को समझ पाए और अपने किरदारों के साथ न्याय कर पाए हों।
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निर्देशक अशोक चौहान ने कहानी पर खूब मेहनत की और फिल्म को मनोरंजक ना बनाकर इसके सन्देश पर ज्यादा ध्यान दिया,फिल्म ये बताती है कि जीवन में शिक्षा का कितना महत्त्व है ,एक पत्रकार और पुलिस समाज में बड़े पैसे वालों से कैसे मुकाबला करते हैं ,पहाड़ों में हो रहे अवैध खनन माफियों की बढ़ती तादाद,फिल्म का कहानी पक्ष काफी शानदार है,संगीत भी उम्दा है और ये फिल्म शिक्षाप्र्द है लेकिन कलाकारों के अभिनय से निराशा हाथ लगी,एक आम दर्शक भी जब ये बात बोले कि फिल्म की कहानी अच्छी है,लेकिन गुणवत्ता और बेहतर होनी चाहिए थी तो समझा जा सकता है कि निर्माता निर्देशक से फिल्मांकन में कहीं ना कहीं चूक हुई है।
निर्माता निर्देशक अशोक चौहान को रत्तब्याण फिल्म बनाने के लिए साधुवाद जिन्होंने फिल्म के जरिए शिक्षा का महत्त्व समझाया और नई पीढ़ी को संघर्ष का पाठ पढ़ाया।
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