फिल्म समीक्षा : भूले को राह दिखाती फिल्म संस्कार ,जैसा नाम वैसा किया काम।

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उत्तराखंड फिल्म जगत अब मजबूत स्थति में लग रहा है पिछले वर्ष कई फिल्म निर्माताओं ने आगे बढ़कर स्थानीय भाषा की फिल्मों को बनाकर एक नई पहल शुरू की बीते सालों में साल दो साल में चुनिंदा फ़िल्में ही बनती थी लेकिन वर्ष 2024 में 15 फ़िल्में बड़े परदे पर रिलीज़ हुई तो अब जाकर लगता है कि फिल्म निर्माताओं के साथ ही दर्शकों को भी स्थानीय भाषा की फिल्मों से लगाव हो रहा है,ऐसी ही एक फिल्म पिछले वर्ष रिलीज़ हुई थी जिसका नाम है ‘संस्कार’ आज इसी पर चर्चा करते हैं। 

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PR Films के बैनर तले बनी फिल्म ‘संस्कार ‘ ने दिल्ली ,फरीदाबाद और ऋषिकेश में खूब लोकप्रियता पाई,फिल्म रिलीज़ होने से पहले ही फिल्म के डायलॉग दर्शकों की जुबानी चढ़ गए,PR Films ने सोशल मीडिया का बखूबी इस्तेमाल किया और इसका नतीजा सिनेमाहॉल में भी देखने को मिला,दर्शकों ने चाहे दिल्ली हो या ऋषिकेश संस्कार फिल्म को बड़ी दिलचस्पी से देखा और जितने दर्शकों के मन को हम टटोल सके कोई ऐसा नजर नहीं आया जिसको फिल्म पसंद नहीं आई हो।

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संस्कार की कहानी लिखी है पदम् गुसाईं ने जो कि खुद एक मंझे हुए अभिनेता हैं और कैका बाना जैसी सुपरहिट फिल्म में अपने अभिनय की छाप छोड़ चुके हैं,एक कुशल कहानीकार से आप जितनी उम्मीदें कर सकते हैं पदम् गुसाईं ने वो सब किया एक अच्छी कहानी ,अच्छे डायलॉग जो दर्शकों को एकदम से याद हो सकें और उसके ऊपर गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी के लिए ऐसा गीत लिखना मानों सबका बचपन लौट आया हो,फिल्म की कहानी दो भाइयों पर केंद्रित है जैसा कि अक्सर फिल्मों में देखने को मिलता है एक भाई अच्छी राह पर है अच्छा खाने कमाने वाला है घर की फ़िक्र करता है वहीँ दूसरा भाई मौज मस्ती में जिंदगी काट रहा है, ये कहानी आपने बॉलीवुड में भी देखी होगी लेकिन अपने परिवेश और अपनी भाषा पर बनी फिल्म देखने का मजा ही अलग है,वो ठेठ गढ़वाली मुहावरे जो एक फिल्म को रोचक बनाते हैं।

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पदम् गुसाईं ने इस फिल्म के हर किरदार को बारीकी से लिखा है,और फिल्म के किरदारों ने वो सब कर दिया कि ये फिल्म किसी बॉलीवुड की फिल्म से कम नहीं लगती फिल्म मल्टीस्टारर फिल्म है,इसमें उत्तराखंड फिल्म जगत के दिग्गज अभिनेता बलदेव राणा हैं जिनका डायलॉग आपने सोशल मीडिया पर सुन ही लिया होगा ‘गैणा सिंह च मेरु नौं -रात का गैणा दिन मा दिखे देलु। तो जो खलनायक दिन में तारे दिखा सकता हो वो बलदेव राणा से बेहतर कोई नहीं हो सकता वही ठेठ गढ़वाली डायलॉग बोलने का पुराना अंदाज और लुक ऐसा मानो कोई बॉलीवुड का नामी खलनायक हो जो स्क्रीन पर आते ही हॉल में डर का माहौल पैदा कर देता है,हर खलनायक का एक दाहिना हाथ होता है और इस फिल्म में आनंद सिल्सवाल ने मणि की भूमिका में वही न्याय किया है,अब आते हैं फिल्म के नायक पर जो कि राजेश मालगुडी और संजू सिलोड़ी हैं,दोनों का ही किरदार एक दूसरे से काफी अलग हैं दोनों भाई होने के बाद भी अलग-अलग राहों पर हैं,राजेश मालगुडी (इंस्पेक्टर अमन ) जहाँ गरीबी को समझकर परिवार संभालता है वहीँ संजू सिलोड़ी (आकाश ) जल्दी से अमीर होने की चाह में गलत राह पकड़ लेता है।

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फिल्म में शिवानी भंडारी एक चुलबुली किरदार में हैं लेकिन काफी सुलझी हुई लड़की है जो अपने प्रेमी को सही राह दिखाने का प्रयास करती है वहीँ अंकिता परिहार डॉक्टर की भूमिका में हैं ,अंकिता का अभिनय सराहनीय है और हर किरदार के साथ न्याय करती हैं,फिल्म में रमेश रावत एक हास्य किरदार में हैं स्क्रीन टाइम भले ही कम हो लेकिन जब भी स्क्रीन पर आए दर्शकों को खूब हंसाया ,बड़े -बड़े दिग्गजों के बीच लखपत चाचा(हर्ष खत्री ) के किरदार ने दर्शकों के दिल में अपनी जगह बनाई,फिल्म में माँ के किरदार में कुसुम चौहान खूब जमी और एक माँ अपने बेटों को लेकर कितनी चिंतित रहती है इसका नजारा फिल्म में देखने को मिला।अमित डोरेमॉन,राजेंद्र भट्ट ,बी एस नेगी,कुलदीप असवाल, आनंद राणा,पूनम सकलानी ,गोपाल रावत, केशव नौटियाल, केशव भट्ट, प्रशांत सारजुली , पूनम रावत, राज कबसुडी ,मोहित चौधरी ,अभिषेक ,नितेश बिष्ट ,आदर्श रमोला ,ऋषभ गुसाईं ने अपने-अपने किरदार बखूबी निभाए।

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फिल्म हर पक्ष से शानदार है और एक फिल्म में जितने भी भाव हो सकते हैं वो सब हैं माँ का लाड प्यार रुलाता भी है तो हास्य किरदार हंसाते भी हैं ,संजू और शिवानी का रोमांस भी है तो डॉक्टर और इंस्पेक्टर का वो प्रेम भी है जो एक परिपक्व प्रेमियों को दर्शाता है,तो हीरो और विलेन की जबरदस्त टक्कर भी है ,फिल्म के निर्देशक बृज रावत और राजू नेगी ने उत्तराखंड को एक बेहतरीन फिल्म दी है सीमित संसाधनों में इस तरीके की फिल्म बनाना अपने आप में एक उपलब्धि है फिल्म में गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी का एक गीत ‘हे रे बालपन’ भी है जो दोनों ही नायकों को बचपन की याद दिला देता है,वहीँ संजय कुमोला और मीना राणा का ‘ओ मेरी सौंजडया ‘ भी है जिसे बहुत ही खूबसूरती से फिल्माया गया है।मनोज सती ने बेहतरीन फिल्मांकन किया और उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों को स्क्रीन पर दर्शनीय बनाया है।सोहन चौहान और गोविन्द नेगी की जोड़ी ने ओ मेरी सौंजडया गीत को प्रेमियों के लिए ख़ास बनाया है।फिल्म में अमित खरे ,सौरव मैठाणी ,पूनम सती,पदम् गुसाईं ,जीतेन्द्र पंवार ,लेखराज भंडारी,अंजलि खरे के भी गीत हैं जो फिल्म को और भी खास बनाते हैं ,संजय कुमोला ने शानदार संगीत तैयार किया है।

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कुल मिलाकर ये फिल्म एक कम्पलीट मसाला फिल्म है जिसे दर्शक आसानी से 3 घंटे देख सकते हैं और अगर आपने अभी तक फिल्म नहीं देखी तो इन दिनों देहरादून के मॉल ऑफ़ देहरादून में फिल्म लगी है जल्दी से टिकट बुक कराइए और देखिए संस्कार फिल्म जैसा नाम वैसा काम,यकीन मानिए बदलते दौर में एक पारिवारिक फिल्म देखकर आप निराश नहीं होंगे।

देखिए संस्कार फिल्म देखकर क्या बोले दर्शक।