भिटोली की भावुक और संवेदनशील कथा, आज भी बेटियों को रहता है इन्तजार

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बहुत समय पहले, पहाड़ों के एक दूर-दराज़ गांव में देबुली और नरिया नामक भाई-बहन रहते थे। यह कहानी उस समय की है जब आज की तरह तकनीकी साधन उपलब्ध नहीं थे, और मानवीय रिश्ते अधिक सशक्त और गहरे होते थे। देबुली और नरिया का बचपन बहुत प्यार और स्नेह से बीता था। बचपन से ही उनका संबंध बेहद आत्मीय था। देबुली का नरिया से प्यार कभी कम नहीं हुआ, और नरिया भी अपनी बहन को बहुत मानता था। दोनों एक-दूसरे के बिना एक दिन भी नहीं रह पाते थे।

समय बीता और दोनों बड़े हो गए। देबुली की शादी हो गई, और उसे ससुराल जाना पड़ा। लेकिन उसका ससुराल मायके से बहुत दूर था, ऐसे में अपनी बहन से मिलना और उससे बातें करना मुश्किल हो गया था। उस वक्त ना इंटरनेट था, ना फोन पर वीडियो कॉल की सुविधा थी। ऐसे में देबुली को अपने ससुराल में जीवन जीने में कठिनाइयाँ आ रही थीं, और वही नरिया भी अपनी बहन की बहुत याद करने लगा।

नरिया अपनी बहन से दूर रहने पर बहुत अकेला महसूस करने लगा था। उसे अपनी बहन के बिना हर चीज़ अधूरी सी लगती थी। फिर एक दिन, उसकी माँ ने नरिया से कहा, “बहुत दिन हो गए, तुझे अपनी बहन देबुली की याद बहुत आती है न?” नरिया ने अपनी माँ की बात पर गंभीरता से विचार किया और कहा, “हाँ, माँ, मुझे बहुत याद आती है।” उसकी माँ ने कहा, “तुम उसकी याद में यह सामान भेज दो, ताकि वह समझ सके कि हम उसे हमेशा याद करते हैं।”

अगले दिन, देबुली के लिए नरिया की माँ ने हलुआ, पूड़ी, पुए और फल तैयार किए। इसके साथ ही कुछ नए कपड़े, एक साड़ी और बिंदी भी रखे गए। सब सामान को एक सुंदर रिंगाल की डलिया में रखा गया, और नरिया से कहा गया कि वह इसे अपनी बहन को ससुराल तक पहुंचा दे।

यह पहाड़ी रास्ते बहुत कठिन थे। सड़कों का नामोनिशान नहीं था, और रास्ते पर जाने के लिए सिर्फ पैदल ही यात्रा की जा सकती थी। नरिया को अपनी बहन के घर तक पहुंचने के लिए दो से तीन दिन लग गए। रास्ते में थकान के बावजूद उसने हिम्मत नहीं हारी और अपने दिल में यह सोचकर आगे बढ़ता रहा कि वह अपनी बहन को खुश देखेगा। आखिरकार, जब नरिया देबुली के ससुराल पहुंचा, तो उसने देखा कि देबुली सो रही थी।

नरिया ने सोचा, “देबुली तो दिन भर काम करती रहती है, अब शायद उसे थोड़ा आराम करने का समय मिला होगा। अब मैं उसे क्यों जगाऊं? उसे आराम करने देना चाहिए।” उसने सोचा कि अगर वह देबुली को उठा देगा तो उसका आराम बिगड़ जाएगा। नरिया ने चुपचाप डलिया रखी और बैठकर अपनी बहन के उठने का इंतजार किया।

वह बहुत समय तक बैठा रहा, लेकिन जब देबुली नहीं जागी तो उसने बिना कुछ कहे, बिना किसी से मिले, सामान वहीं छोड़ दिया और वापस लौटने का फैसला किया। उसकी नीयत यह थी कि वह जल्द से जल्द घर वापस पहुंचे, क्योंकि बहुत समय हो चुका था।

जब देबुली की आंखें खुली, तो उसने देखा कि उसके सामने एक डलिया रखी हुई है, और उसमें कुछ पकवान और उपहार रखे हुए थे। उसने समझ लिया कि उसका भाई नरिया आया था, लेकिन वह उसे जगाने के बजाय बिना बात किए वापस चला गया। देबुली का दिल टूट गया। उसे यह सोचकर गहरा दुख हुआ कि उसका भाई इतनी दूर से पैदल चला आया था, लेकिन वह उसे ठीक से पानी तक नहीं दे सकी।

देबुली की आंखों से आंसू बहने लगे और उसने आत्मग्लानि में डूबते हुए कहा, “भै भूखों-मैं सिती,” यानी “भाई भूखा रहा और मैं सोती रही।” यह वाक्य उसके दिल के गहरे जख्म को बयान कर रहा था। उसकी पीड़ा इतनी गहरी थी कि वह अपनी इस गलती को नहीं भूल पाई। वह इसी ग़म में डूबकर बहुत देर तक रोती रही। उसके अंदर यह पछतावा घर कर गया कि उसने अपनी बहन के भाई को बिना कुछ दिए वापस जाने दिया।

कहा जाता है कि उसी ग़म और पछतावे के कारण अगले जन्म में देबुली घुघुति नामक पक्षी बन गई। यह पक्षी अब हर साल चैत्र मास में “भै भूखों-मैं सिती” की आवाज़ लगाती है। यह आवाज अब भी सुनाई देती है, जो उस गहरे दुःख और पछतावे को व्यक्त करती है, जो देबुली ने अपनी आँखों से बहाया था।

इसके बाद, इस कथा से एक नई परंपरा का जन्म हुआ। विवाहिता महिलाएं जब अपने मायके जातीं, तो वह यात्रा किसी पर्व या त्यौहार से कम नहीं होती थी। भिटोली भेजने की परंपरा शुरू हुई, जिसमें मायके से अपनी बहन को भिटोली भेजी जाती थी। यह परंपरा अब भी बरकरार है, और यह दर्शाती है कि रिश्तों में स्नेह, समर्पण और अपार प्यार का कोई अंत नहीं होता।

“भै भूखों-मैं सिती” का अर्थ अब भी लोगों के दिलों में गहरे अर्थ रखता है। यह उस प्रेम और समर्पण की कहानी है, जो कभी दूर होकर भी हमसे जुड़ा रहता है। भिटोली के माध्यम से, हम अपनी भावनाओं और रिश्तों को सहेजते हैं, और यही परंपरा हर शादीशुदा महिला के दिल में एक गहरी जगह रखती है।