खेती बाड़ी की सौंधी महक ने साहित्य को महकाकर बुलंदी तक पहुंचाया उपासना सेमवाल को …!

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कहते हैं जब सितारे बुलंदी पर हों तो संघर्ष सफलता की कहानी स्वयं गढ़ लेती है। साहित्य और संस्कृति की बात हो और उपासना सेमवाल का नाम न हो बात अपूर्ण मानी जाती है। कवियत्री उपासना आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। केदारघाटी के हयूंण गाँव निवासी उपासना सेमवाल घाटी की पहली महिला हैं जिसे महिलाओं का सर्वोत्कृष्ट सम्मान ‘तीलू रौंतेली ‘ से उत्तराखण्ड सरकार ने सम्मानित किया है।

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पहाड़ की परम्परायें,संस्कृति ,तथा गढ़वाली बोली को अग्रसर रखने की दिशा में बेहतर कार्य करने के लिए उपासना को अब तक चार दर्जनों से अधिक सम्मानों से नवाजा जा चुका है। उपासना का भगवान् श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं पर आधारित बाल गोविंदा जागर यूट्यूब पर खूब धूम मचा चुका है,इसके साथ ही उनकी कई गढ़वाली एवं हिंदी कविताओं ने श्रोताओं के
दिलों पर गहरी छाप छोड़ चुके हैं।जिनमे मसाण, हे मेरा देश का रजा मोदी लोकप्रिय हैं।उपासना सेमवाल की बेटी बिराणी बनाई किलै के तीन जो यूट्यूब के लिए पहली बार रिकॉर्ड की गई थी जिसे पांडवाज यूट्यूब चैनल पर रिलीज़ किया गया। अभी तक इस कविता को दर्शक 2 लाख व्यूज दे चुके हैं। इनके द्वारा रचित अन्य कविताओं में फेसबुक कु रोग,यु कनु जमानु आई,पैली तुमारा म्येरा बीच कति प्रेम छो आदि गढ़वाली कविताओं को लाखों लोगों ने देखा और दिल से सराहना की है।

उपासना सेमवाल की आवाज में मधुर भजन सुनिए : बाल गोविंदा जी

उपासना सेमवाल की कविताओं में वास्तविकता से बेहद करीबी,ठेठ पहाड़ी बोलों के मिश्रण के साथ पूरा पहाड़ बसता है,इनकी कविताओं में आपको कभी पीठ पर बोझ ढोती महिलाओं का दर्द ,तो कहीं पर लगातार खाली होते पहाड़ की दास्तां,कहीं प्रेमी -प्रेमिका की नौंक झोंक दिखेगी।इसके साथ ही वर्तमान परिवेश की राजनीति पर कटाक्ष करने पर भी संदेह नहीं किया है। सभी सृजित कविताओं में उपासना के शब्दों ने मानव मन को बेहद करीब से स्पर्श किया है। उपासना समाज में दहेज उन्मूलन, बाल विधवा विवाह आदि पर निरंतर कार्य कर रही है। गांव गांव जाकर गरीब व निराश्रित बेटियों की शादी में भी विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से आर्थिक मदद पहुंचाती है। बकौल उपासना अभी तक 21 निर्धन बेटियों की शादी में विभिन्न श्रोतों से आर्थिक मदद पहुंचाई है। इसके साथ ही वृद्ध, बिकलांग तथा निर्बल व्यक्तियों के लिये पेंशन योजना की औपचारिकतायें भी पूर्ण करती है।

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जनपद रूद्रप्रयाग के विश्वनाथ मंदिर के लिये प्रसिद्ध गुप्तकाशी के निकट हयूण गांव की निवासी उपासना सेमवाल के पति विपिन सेमवाल पत्रकार हैं। अपनी इस उपलब्धि का श्रेय अपने पति को देने वाली उपासना उत्सुकतावश कहती है, कि उनके पति ने ही उन्हें आज इस मुकाम तक पहुंचाने में सीढ़ियां निर्मित की हैं। सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते हुये आज साहित्य के क्षेत्र में उपासना ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा का लोहा भी मनवाया है। वो कहती हैं, कि जैसे हर सफल पुरूष की सफलता के पीछे एक स्त्री का हाथ होता है, वैसे ही उनका मानना है, कुछ स्त्रियों की सफलता के पीछे भी पुरूष का हाथ होता है। समाज के कसैले अनुभवों से पार पाकर आज उपासना महिलाओं के लिये नजीर बन गयी है। शादी के नौ वर्षों तक जंगल, मवेशियों के पालन में अपना वक्त जाया करने वाली उपासना का वैवाहिक जीवन भी कम संघर्षमय नहीं रहा है। शादी के बाद अमूमन वक्त खेत खलियान तथा गौ सेवा के इर्द गिर्द ही गुजरा है। जंगल में घास आदि के लिये जाने के बाद अवशेष वक्त में प्रकृति की नैसर्गिक सौन्दर्यता में खोकर उपासना ने कई कवितायें रच डाली । मगर उनके शब्द केवल सफेद पेजों की स्याह लाइनों में ही अपना अस्तित्व तोड़ने लगी। इसके बाद उनकी पहली कविता फेसबुक का रोग जैसे ही फेसबुक पर आयी, एकदम चमत्कार सा हो गया। कलश साहित्यिक संस्था के प्रणेता ओमप्रकाश सेमवाल ने कविता पर दृष्टिपात किया, और इस लेखिका में उन्हें अपार संभावनायें दिखी, उन्होने एक मंच पर कविता पाठ करने के लिये आमंत्रित किया। बस फिर क्या था, उपासना ने उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। लगभग साठ से अधिक मंचों पर अपनी कविताओं का पाठ करके सबको अपनी मुरीद बना दिया। विभिन्न संस्थाओं तथा प्रशासन ने उन्हें विभिन्न सम्मानों से अंलंकृत भी किया है। मिटृटी से सने हाथों में पकड़ी कलम ने उन्हें आज जिस मुकाम तक पहुंचाया है, वो चिरकाल तक सभी लोगों की यादों में समाधिस्त रहेगा।

दूरदर्शन पर आयोजित माटी पाणी कार्यकर्म के दौरान उपासना सेमवाल

UPASANA DOORDARSHAN

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उपासना सेमवाल की कविता बेटी बिराणी बनाई किलै सुनिए:

HILLYWOOD NEWS
RAKESH DHIRWAN

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