उत्तराखंडी संगीत का सफर: रेडियो से डिजिटल युग

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उत्तराखंड की पहाड़ी म्यूजिक इंडस्ट्री जिसमें समाया है गढ़वाल कुमाऊ और जौनसार ने पिछले कुछ दशकों में बहुत बदलाव देखे हैं। 1949 से शुरू हुई और 2000 तक के दशक में इस उद्योग ने कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन अब यह उद्योग नए आयामों को छू रहा है। वैसे तो उत्तराखंडी गीतों का दौर 19 के दशक में शुरू हुआ लेकिन बाजारों में आते आते बहुत लम्बा समय लगा। उत्तराखंड के लोक संगीत में समय के साथ बहुत बदलाव आया है, लेकिन इसकी सांस्कृतिक परंपराएं और हिमालय की सुंदरता को दर्शाने की क्षमता अभी भी बरकरार है। पारंपरिक वाद्ययंत्रों जैसे कि ढोल, दमाऊ, और तुरी रणसिंघा का उपयोग अभी भी उत्तराखंडी लोक संगीत में किया जाता है, लेकिन हाल के वर्षों में वैश्विक संगीत वाद्ययंत्रों को भी शामिल किया गया है। साथ ही आजकल डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से संगीत को प्रस्तुत करने का चलन बढ़ रहा है। जिससे कलाकारों को भी अपनी प्रतिभा को पूरे देश में प्रस्तुत करने का मौका मिल रहा है। पहाड़ में रेडियो के दौर को ही गीतों का उदय माना जाता है। क्योंकि जो पहाड़ की रीढ़ कहीं जाती है उन्हें  अपने घरों में रेडियो के माध्यम से ही गीत सुनने को मिले। उत्तराखंड संगीत ने हर दौर देखा जीत सिंह नेगी ने पहली बार 1949 में अपने 6 गीत ग्रामोफोन पर रिकॉर्ड करवाए और उसी दौरान राज्य को मिला अपना पहला लोकगीत “बेडु पाको बारामासा” और फिर शुरू हो गया पहाड़ के लोगों को पहाड़ की जीवन शैली से रूबरू करवाने का दौर यानि की पहाड़ी संगीत का जन्म।

 

उत्तराखंड के कई प्रसिद्ध लोक गायकों ने अपनी आवाज़ और संगीत के माध्यम से उत्तराखंडी लोक संगीत को एक नई ऊंचाई तक पहुंचाया है। इनमें मोहन उप्रेती, नरेंद्र सिंह नेगी, चंदर सिंह राही, मीना राणा, जीत सिंह नेगी, गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’, और प्रीतम भरतवाण शामिल हैं। इन गायकों ने उत्तराखंडी लोक संगीत को विभिन्न शैलियों में प्रस्तुत किया है, जैसे कि जागर, चौमासा, थड्या, और पार्श्व। उन्होंने गढ़वाली, कुमाऊँनी, जौनसारी, और रावल्टी जैसी विभिन्न स्थानीय भाषाओं में गीत गाए हैं। उत्तराखंडी लोक संगीत में सामान्य विषयों में क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता, मौसमी परिवर्तन, त्यौहार, धार्मिक परंपराएँ, सांस्कृतिक प्रथाएँ, लोक कथाएँ, ऐतिहासिक शख्सियतें, पूर्वजों की बहादुरी और प्रेम गाथाएँ शामिल हैं।

 

डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का उदय

पहले के समय में, पहाड़ी गीतों को सुनने के लिए लोगों को रेडियो और कैसेट्स पर निर्भर रहना पड़ता था। रेडियो पर पहाड़ी गीतों के कार्यक्रम प्रसारित होते थे, जिन्हें लोग बड़े चाव से सुनते थे। कैसेट्स भी बहुत लोकप्रिय थीं, जिन पर पहाड़ी गीतों को रिकॉर्ड किया जाता था और लोग उन्हें खरीदते थे।गाड़ियों में भी कैसेट्स चलती थीं, जिससे लोग यात्रा के दौरान पहाड़ी गीतों का आनंद लेते थे। लेकिन उस समय, पहाड़ी गीतों को सुनने के अवसर सीमित थे, और लोगों को इन गीतों को सुनने के लिए बहुत प्रयास करना पड़ता था।

 

 

लेकिन परिवर्तन ही जीवन का नियम है और अब बदलते समय के साथ इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के आने से पहाड़ी संगीत उद्योग में क्रांति आ गई है। अब लोग यूट्यूब, गाना, सावन, और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पहाड़ी गीतों को आसानी से सुन सकते हैं। इन प्लेटफॉर्म्स पर पहाड़ी गीतों का विशाल संग्रह उपलब्ध है, जिससे लोग अपने पसंदीदा गीतों को कभी भी और कहीं भी सुन सकते हैं।  इसके अलावा, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पहाड़ी गीतों को सुनने के लिए लोगों को कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता है। वे अपने मोबाइल फोन या कंप्यूटर पर इन प्लेटफॉर्म्स को एक्सेस कर सकते हैं और अपने पसंदीदा गीतों को सुन सकते हैं। इससे पहाड़ी संगीत उद्योग को एक नई दिशा मिली है, और लोगों को पहाड़ी गीतों का आनंद लेने का एक नया तरीका मिला है। इसके अलावा, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पहाड़ी गीतों को सुनने के लिए लोगों को अपने पसंदीदा गीतों को रिपीट करने का भी विकल्प मिलता है। इस प्रकार, पहाड़ी संगीत उद्योग में समय के साथ बहुत बदलाव आया है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के आने से लोगों को पहाड़ी गीतों का आनंद लेने का एक नया तरीका मिला है, और पहाड़ी संगीत उद्योग को एक नई दिशा मिली है।

 

 

आधुनिक संगीत शैलियों का प्रभाव

अब के समय में आधुनिक संगीत शैलियों जैसे कि पॉप, रॉक, और हिप-हॉप ने पहाड़ी संगीत उद्योग पर अपना प्रभाव डाला है। कई गायक अब आधुनिक संगीत शैलियों में पहाड़ी गीतों को प्रस्तुत कर रहे हैं। जबकि शुरूआती दौर में ढोल, दमाऊं, भंकोरा, बिणाई, मुशक बीन, बांसुरी, तुरतुरी, तुरही, गोंग, डौर , रणसिंघा जैसे वाद्ययंत्रो का उपयोग किया जाता था।

 

पहाड़ी संगीत का वैश्विक प्रसार
अब के समय में पहाड़ी संगीत का वैश्विक प्रसार हो रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से पहाड़ी गीतों को दुनिया भर में सुना जा सकता है। इससे पहाड़ी संगीत को एक नई पहचान मिल रही है। साथ ही साथअब के समय में पहाड़ी संगीत उद्योग में कई नई प्रतिभाएं उभर रही हैं। ये नई प्रतिभाएं नए और अनोखे गीतों को प्रस्तुत कर रही हैं और लोगों को पसंद आ रही हैं।

 

 

कुल मिलाकर आधुनिक संगीत शैलियों का प्रभाव भी पहाड़ी संगीत उद्योग पर पड़ा है, जिससे पहाड़ी गीतों में एक नए और अनोखे स्वरूप का उदय हुआ है। नई प्रतिभाओं का उदय भी पहाड़ी संगीत उद्योग के लिए एक सकारात्मक संकेत है। इन बदलावों के साथ, पहाड़ी संगीत उद्योग ने एक नई ऊंचाई तक पहुंचाया है और इसका वैश्विक प्रसार हो रहा है। यह बदलाव न केवल पहाड़ी संगीत के लिए बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति और परंपराओं के लिए भी एक सकारात्मक संकेत है। हालांकि ठेठ पहाड़ीपन गीतों से दूर होता जा रहा है आज गीत भले ही ट्रेंडिंग में चल रहे हों लेकिन उनमें वो बात नहीं जो शुरूआती दौर में था और आज भी पहाड़ का व्यक्ति कहीं भी लेकिन उसकी जड़ें पहाड़ो में रहती हैं और उन जड़ों को जीवंत पहाड़ के वहीं गीत रखते हैं।