हर वर्ष जब भी राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानों की घोषणा होती है तो उत्तराखंड में सोशल मीडिया पर एक सवाल तैरता रहता है और हर वर्ष इस सवाल को पूछने वालों की संख्या में वृद्धि होती रही है,पहाड़ का एक ऐसा कवि ,साहित्यकार,गीतकार और लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी जिन्हें पहाड़ी समाज ने गढ़रत्न की उपाधि दी,प्रेम से उन्हें नेगी दा बुलाते हैं।उनका हर एक गीत शोध का विषय है जो जीवन के प्रारम्भ से अंत तक की यात्रा अपने गीतों में दर्शाते हों ऐसा कलाकार क्यों वो सम्मान नहीं पाता जिसे कब का मिल जाना चाहिए था।खैर इस खबर में हम उन बातों पर नहीं जाना चाहते कि किन कारणों से नहीं मिला लेकिन ये एक छोटा सा अंश है जिसे आपके समक्ष रख रहे हैं कि आखिर इतने बड़े कलाकार को सम्मान क्यों नहीं।
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जब भी भारत में सबसे लंबे म्यूज़िक करियर की बात होती है, तो आमतौर पर लता मंगेशकर, आशा भोसले और येसुदास जैसे बड़े नाम सामने आते हैं। लेकिन इसी सूची में एक ऐसा नाम भी है, जिसने बिना बॉलीवुड, बिना बड़े म्यूज़िक लेबल और बिना मेनस्ट्रीम सपोर्ट के, आधी सदी से ज़्यादा समय तक अपनी आवाज़ से करोड़ों लोगों के दिल जीते वो हैं उत्तराखंड के लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी,जिनकी शुरुआत लगभग 1970 के दशक में संगीत जगत में हुई तब ना कोई साधन थे ग्रामोफोन,रेडियो,सीडी,वीसीडी के बाद अब डिजिटल दौर,इस तरह से उनका म्यूज़िक करियर 53 से 55 साल पूरा कर चुका है, जो उन्हें भारत के उन गिने-चुने कलाकारों की सूची में शामिल करता है, जिनका करियर 50 साल से ज़्यादा रहा है।
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संगीत विशेषज्ञों के मुताबिक भारत में 50+ साल का करियर रखने वाले कलाकारों में आशा भोसले, लता मंगेशकर, के. जे. येसुदास, अनूप जलोटा और एस. पी. बाला सुब्रह्मण्यम के बाद नेगी दा का नाम शीर्ष 5–6 में आता है।खास बात यह है कि नरेंद्र सिंह नेगी ने अपने पूरे करियर में मुख्य रूप से गढ़वाली और कुमाऊँनी लोक संगीत को ही चुना।उन्होंने 1000 से ज़्यादा गीत गाए, जिनमें पहाड़ का जीवन, पलायन, सामाजिक संघर्ष, राजनीति और आम आदमी की पीड़ा साफ झलकती है उत्तराखंड में उन्हें सिर्फ़ गायक नहीं बल्कि “लोक इतिहासकार” भी कहा जाता है, क्योंकि उनके गीत किसी दस्तावेज़ की तरह पहाड़ की सच्चाई बयान करते हैं।आज के दौर में जब गाने कुछ महीनों में ट्रेंड से बाहर हो जाते हैं, ऐसे समय में नरेंद्र सिंह नेगी का 50 साल से ज़्यादा लगातार जनता के दिलों में बने रहना, अपने आप में एक राष्ट्रीय रिकॉर्ड माना जा सकता है।
ये पंक्तियां सभी श्रोताओं को समर्पित।
भैरा का रंगो मा आंखा रगरयांदा, भीतर का रंगों कु भेद नी पांदा।
जिकुडा कु रंग पछ्याणी जौन ,ऊ सयाणा कभी धोखा नि खांदा।
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