उत्तराखंड की परंपराओं और संस्कृति की खुशबू आज भी लोगों के दिलों में बसती है। इसी परंपरा को एक नई मिसाल के रूप में उत्तरकाशी जिले के मोरी तहसील के कलीच गांव में देखने को मिला, जहां एक दुल्हन ने खुद अपनी बारात लेकर दूल्हे के घर पहुंचकर सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
यह अनोखी शादी रविवार की रात संपन्न हुई। कलीच गांव के पूर्व प्रधान कल्याण सिंह चौहान के पुत्र मनोज की शादी ग्राम जाकटा की कविता से हुई। खास बात यह रही कि दुल्हन कविता ने ढोल-दमाऊं और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप पर अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ बारात निकाली, जो पूरे गांव के लिए आकर्षण का केंद्र बन गई।
दूल्हे के घर पहुंचने पर बारात का स्वागत भी पारंपरिक रीति-रिवाजों से किया गया। इस दौरान न तो किसी तरह की दिखावेबाज़ी हुई और न ही दहेज जैसी कोई प्रथा अपनाई गई। दोनों परिवारों ने विवाह को पूरी सादगी और सांस्कृतिक गरिमा के साथ पूरा किया।
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दरअसल, यह परंपरा ‘जोजोड़ा विवाह’ के नाम से जानी जाती है। माना जाता है कि ‘जोजोड़ा’ का अर्थ होता है — वह जोड़ा जिसे भगवान खुद बनाते हैं। इस रिवाज़ की शुरुआत इसलिए हुई थी ताकि बेटी के पिता पर आर्थिक बोझ न पड़े और विवाह को सामाजिक समानता का रूप दिया जा सके।
कभी जौनसार-बावर और बंगाण क्षेत्र में इस तरह के विवाह आम हुआ करते थे, लेकिन बीते लगभग पचास वर्षों में यह परंपरा धीरे-धीरे खत्म हो गई थी। अब कविता ने अपने विवाह के माध्यम से इस भूली-बिसरी परंपरा को फिर से जीवंत कर दिया है।
दूल्हे के पिता कल्याण सिंह, जो सामाजिक और वैचारिक मुद्दों पर सक्रिय माने जाते हैं, का कहना है कि अपनी संस्कृति और परंपराओं को बचाना आज की पीढ़ी की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि अगर हम अपनी जड़ों से जुड़े रहेंगे, तो समाज की पहचान हमेशा कायम रहेगी।
वहीं, स्थानीय इतिहासकार प्रयाग जोशी का मानना है कि 1970 के दशक के बाद सामाजिक और आर्थिक बदलावों ने इस परंपरा को प्रभावित किया, लेकिन नई पीढ़ी द्वारा इसे दोबारा अपनाना यह दर्शाता है कि सांस्कृतिक चेतना अब भी जीवित है।
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कलीच गांव की यह शादी सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की एक प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा का पुनर्जन्म भी है। इस विवाह ने एक बार फिर साबित कर दिया कि आधुनिक दौर में भी अगर इच्छा हो, तो अपनी विरासत को जीवित रखा जा सकता है।






