Uttarakhand News: पहाड़ों की खामोशी बहुत कुछ कहती है। कभी चूल्हों की गर्माहट और बच्चों की खिलखिलाहट से गूंजने वाले ल्वेगढ़ गांव में अब सिर्फ सन्नाटा बचा है। रुद्रप्रयाग जिले के कांडई क्षेत्र का यह गांव उत्तराखंड में बढ़ते पलायन की एक मार्मिक मिसाल बन गया है।
बीते दिनों इस गांव की 90 वर्षीय सीता देवी का निधन हो गया। लेकिन उनके पार्थिव शरीर को श्मशान घाट तक ले जाने के लिए गांव में चार कंधे तक नहीं मिले। सीता देवी का बेटा मानसिक रूप से अस्वस्थ है और गांव में अब कोई अन्य पुरुष बचा ही नहीं है। दो दिन तक शव घर में ही रखा रहा। आखिरकार, पास के गांव — कलेथ, पांढरा मड़गांव और मलछोड़ा — से कुछ लोग आए, तब जाकर उनका अंतिम संस्कार हो सका।
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कभी 15 से अधिक परिवारों का बसेरा रहे इस गांव में अब सिर्फ तीन बुजुर्ग महिलाएं और एक पुरुष ही रह गए हैं। गांव तक पहुंचने का रास्ता झाड़ियों और टूटे पगडंडियों से घिरा हुआ है। सड़क नहीं है, पानी की व्यवस्था नहीं, न स्कूल और न ही कोई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र।
पलायन की मार और सूनी रूहें
यह अकेली कहानी नहीं है। उत्तराखंड के सैकड़ों गांव ऐसे ही वीरान हो चुके हैं या होने की कगार पर हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 1,700 से अधिक गांव ‘घोस्ट विलेज’ यानी पूरी तरह खाली हो चुके हैं। ल्वेगढ़ उन्हीं गांवों की सूची में जुड़ने के अंतिम पायदान पर खड़ा है।
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विकास के वादे, लेकिन कितनी देर में?
ग्राम प्रधान संजय पांडे कहते हैं, “कार्यकाल शुरू हुआ है, प्रयास कर रहे हैं कि रास्ते जल्द सुधारे जाएं।” स्थानीय विधायक भर सिंह चौधरी का कहना है, “मरछोला तक सड़क स्वीकृत हो चुकी है, अब ल्वेगढ़ को भी सड़क से जोड़ा जाएगा।”
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है — जब तक विकास यहां पहुंचेगा, तब तक क्या यहां कोई बचेगा भी?
सिर्फ पत्थर और यादें बचेंगी?
ल्वेगढ़ अब उस त्रासदी का प्रतीक बन चुका है, जहां न सरकार की योजनाएं पहुंच पाती हैं और न ही गांव के बचे लोग। जो कभी जिंदा गांव था, वह अब बस दीवारों और यादों में कैद होकर रह गया है।








